लिनक्स, विकिपीडिया, फेडोरा, फ़ायरफ़ॉक्स आदि की सफलता ने फ्री/ओपन
सोर्स की विचारधारा को मुख्यधारा में ला दिया है. फ्री/ओपन सोर्स
सॉफ़्टवेयर का सारा विकास वास्तव में ‘दिये से दिया जलता रहा है’ के
सिद्धांत पर खड़ा है. पहले भी लोग अपनी जानकारी को अपने सहपाठियों, अपने
मित्रों आदि से साझा करते रहे हैं. पहले विश्वविद्यालयों या शोध संस्थानों
में यदि किसी व्यक्ति को कोई अच्छा विचार आता था जो समाज व तकनीक के लिए
फायदेमंद हो तो उसे वे अपने मित्रों के बीच में साझा करते थे. पसंद आने पर
और भी लोग उससे जुड़ते और वह काम आगे बढ़ने लगता था. ओपन सोर्स सॉफ़्टवेयर
का विकास इसी विधि से होना शुरू हुआ और इंटरनेट व सूचना क्रांति के युग ने
तो इसके प्रसार में व्यापक विस्तार किया. कोई भी व्यक्ति जो भाग लेना चाहे
वह इंटरनेट के माध्यम से इससे जुड़ सकता है और यही वजह है कि आज
हजारों-हजार लोग इससे जुड़कर काम करते हैं. ज्ञान का निःस्वार्थ प्रसार कवि
अशोक वाजपेयी ने महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय के लिए
निकाली गई एक फॉस केंद्रित द्विभाषी पत्रिका ‘लीला’ के संपादकीय में लिखा
था कि ज्ञान के नि:स्वार्थ प्रसार की भारतीय परंपरा बहुत पुरानी और वैश्विक
है. निःसंदेह वेद, उपनिषद जैसे ग्रंथों का पूरा का पूरा विकास तो इसी
प्रकार से हुआ- लगातार विकसित होकर अनगिनत लोगों के योदगान से. हम लोग कह
सकते है कि फ्री सॉफ़्टवेयर आन्दोलन पुरानी भारतीय परंपरा का ही पाश्चात्य
संस्करण है. ओपन सोर्स सॉफ़्टवेयर के उपयोक्ताओं की पहुँच सॉफ़्टवेयर के
सोर्स कोड में होती है. यही मूल बात है जो इसे सांपत्तिक-स्वामित्ववादी
सॉफ़्टवेयर से अलग करती है. इसके अंतर्गत किसी उपयोक्ता को किसी भी
अनुप्रयोग के विकास चक्र में भाग लेने, इसे बदलने व इसमें किसी भी प्रकार
का सुधार कर फिर स्वयं वितरित करने का अधिकार भी देता है. इसमें कोई शक
नहीं कि आज फ्री व ओपन सोर्स सॉफ़्टवेयर अपने बेहद नितांत गुमनामी के दौर
से निकल कर एक सशक्त पहचान तकनीक के नए दौर में बना चुकी है और सभी इसकी
मौजूदगी को गंभीरता से लेने लगे हैं. लेकिन अभी भी सॉफ़्टवेयर की मुक्ति का
यह दर्शन कई बार लोगों की समझ में नहीं आता है.


EmoticonEmoticon