मोहनदास करमचंद गांधी – Mohandas Karamchand Gandhi in Hindi

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मोहनदास करमचंद गांधी का जन्म 2 अक्तूबर सन् 1869 को पोरबंदर में हुआ था. पोरबंदर, ‘जरात कठियावड़’ की तीन सौ में से एक रियासत थी. उनका जन्म एक मध्यमवर्गीय परिवार में हुआ था, जो कि जाति से ‘वैश्य’ था. उनके दादा उत्तमचंद गांधी पोरबंदर के दीवान थे. आगे चलकर 1847 में उनके पिता करमचंद गांधी को पोरबंदर का दीवान घोषित किया गया. करमचंद ने चौथा विवाह पुतलीबाई से किया, जिनकी कोख से गांधीजी ने जन्म लिया. मोहनदास की माँ का स्वभाव संतों के जैसा था. गांधीजी अपनी माँ के विचारों से खूब प्रभावित थे.
गांधीजी की आरंभिक शिक्षा पोरबंदर में हुई. जहाँ गणित विषय में उन्होंने अपने आपको काफी कमजोर पाया. मैट्रिक करने के बाद गांधीजी ने ‘भावनगर’ के समलदास कॉलेज में प्रवेश लिया. यहाँ का वातावरण उन्हें रास नहीं आया, उन्हें पढ़ाई करने में काफी कठिनाइयाँ आ रही थी. इसी बीच सन् 1885 में उनके पिताजी की मृत्यु हो गई. उनके परिवार के विश्वसनीय मित्र भावजी दवे चाहते थे कि मोहनदास अपने दादा व पिता की तरह मंत्री बनें. इस पद के लिए कानून की जानकारी सबस महत्वपूर्ण थी. इसलिए उन्होंने सलाह दी कि मोहनदास इंग्लैंड जाकर बैरिस्टरी की पढ़ाई करें. गांधीजी अपनी इंग्लैंड यात्रा के लिए मुंबई के समुद्री तट पर पहुँचे. यहाँ भी उनके विदेश जाने के खिलाफ जाति-बिरादरी के लोगों ने आपत्ति दर्ज की.
तेरह वर्ष की आयु में मोहनदास का विवाह उनकी हम-उम्र कस्तूरबा से कर दिया गया. उस उम्र के लड़के के लिए शादी का अर्थ नये वस्त्र, फेरे लेना और साथ में खेलने तक ही सीमित था. लेकिन जल्द ही उन पर काम का प्रभाव पड़ा. शायद इसी कारण उनके मन में बाल-विवाह के प्रति कठोर विचारों का जन्म हुआ. वे बाद में बाल-विवाह को भरत की एक भीषण बुराई मानते थे.
भारत ही नही बल्की पूरे विश्व पटल पर महात्मा गाँधी सिर्फ़ एक नाम नहीं शान्ति और अहिंसा का प्रतीक है. महात्मा गाँधी के पूर्व भी शान्ति और अहिंसा की अवधारणा फलित थी, परन्तु उन्होंने जिस प्रकार सत्याग्रह, शान्ति व अहिंसा के रास्तों पर चलते हुये अंग्रेजों को भारत छोड़ने पर मजबूर किया, उसका कोई दूसरा उदाहरण विश्व इतिहास में देखने को नहीं मिलता. तभी तो प्रख्यात वैज्ञानिक आइंस्टीन ने कहा था कि -‘‘हज़ार साल बाद आने वाली नस्लें इस बात पर मुश्किल से विश्वास करेंगी कि हाड़-मांस से बना ऐसा कोई इन्सान धरती पर कभी आया था.’’
गांधीजी ने हमेशा दूसरों के लिए ही संघर्ष किया. मानो उनका जीवन देश और देशवासियों के लिए ही बना था . इसी देश और उसके नागरिकों के लिए उन्होंने अपना बलिदान दिया . आने वाली पीढ़ि की नज़र में मात्र देशभक्त, राजनेता या राष्ट्रनिर्माता ही नहीं होंगे, बल्कि उनका महत्व इससे भी कहीं अधिक होगा . वे नैतिक शक्ति के धनी थे, उनकी एक आवाज करोड़ों लोगों को आंदोलित करने के की क्षमता रखती थी . वे स्वयं को सेवक और लोगों का मित्र मानते थे . यह महामानव कभी किसी धर्म विशेष से नहीं बंधा शायद इसीलिए हर धर्म के लोग उनका आदर करते थे . यदि उन्होंने भारतवासियों के लिए कार्य किया तो इसका पहला कारण तो यह था कि उन्होंने इस पावन भूमि पर जन्म लिया, और दूसरा प्रमुख कारण उनकी मानव जाति के लिए मानवता की रक्षा करने वाली भावना थी .
सचमुच गांधीजी असाधारण न होते हुए भी असाधारण थे . यह संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए गौरव का विषय है कि गांधीजी जैसा व्यक्तित्व यहाँ जन्मा . मानवता के पक्ष में खड़े गांधी को मानव जाति से अलग करके देखना ए बड़ी भूल मानी जायेगी. 1921 में भारतीय राजनीति के फलक पर सूर्य बनकर चमके गांधीजी की आस्था से आज भी हमारी धरती का रूप निखर रहा है . उनके विचारों की सुनहरी किरणें विश्व के कोने-कोने में रोशनी बिखेर रही हैं . हो सकता है कि उन्होंने बहुत कुछ न किया हो, लेकिन जो भी किया उसकी उपेक्षा करके भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का इतिहास नहीं लिखा जा सकता .
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